Monday, 17 February 2014

धर्म और राज नीति दोनों एक होगे तभी देश में सुख शान्ति सम्भव है|

धर्म और राज नीति दोनों एक होगे तभी देश में सुख शान्ति सम्भव है|

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी ।
सो नृपु अवसि नरक अधिकारी ॥ 

लोकतांत्रिक साम्राज्य में नागरिको (प्रजा) का शासक राजा कहलाता है| राजाओ पर शासन करने वाला वीतराग संत- महात्मा होते है, धर्म और धर्माचार्यो पर राजा का शासन नहीं चलता है| उन पर शासन करना शासक का घोर अन्याय है राजा पर यदि संतो धर्माचार्यो का शासन नहीं होगा तो राजा उच्छश्रंखल का  हो जायेगा और निर्बुद्धि राजा ही धर्म और धर्माचार्यो पर शासन करता है उन पर अपनी  आज्ञा चलाता है क्योकि वह शासक यह समझता है कि बुद्धि मेरे ही पास है! दुसरा भी कोई बुद्धिमान हो ये बात उसे जचती नहीं है|
पहले हमारे भारत में राजा महाराजा लोग राज्य करते थे, किन्तु सलाह ऋषि मुनियो से लिया करते थे| कारण कि अच्छी सलाह वीतराग पुरुषो से ही मिल सकती है| भोगी पुरुषो से नहीं| इसलिए कानून बनाने का अधिकार वीतराग पुरुषो को ही है| जिसका कठोरता पूर्वक पालन करवाना शासक का धर्म है\ आज यही कारण है हमारे इन्ही सिद्धांतो पर शोध करके, पाश्चात्य सभ्यता के राजा निरंतर अनुशासन में रहते हए विकास करते जा रहे है| राजा दशरथ एवं भगवान राम चन्द्र सरकार भी प्रत्येक कार्यो में वीतराग वसिष्ठ जी से सम्मति लेते थे ,और उनकी आज्ञा से ही सब काम किया करते थे| परन्तु आजकल के शासक वीतराग संतो महात्माओ का अपमान, तिरस्कार करते है| जो शासक खुद वोटो के लोभ में, स्वार्थ में लिप्त है उस भ्रष्ट शासक द्वारा  बनाये गए कानून देश के हित और नागरिक के विकास के कैसे ठीक होंगे ? धर्म के बिना नीति विधवा है,और और नीति के बिना धर्म विधुर है| धर्म और राजनीति - दोनों साथ साथ होने चाहिए| तभी "रामराज्य" कि कल्पना करना सार्थक होगा|
रामराज्य कि झाकी अश्वपति के वचनो से मिलती है.............
" न में स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मधपः|
नाना हइटअग्निरनाविद्द्वान्न स्वैरी स्वैरिणि कुतः ॥ "
न कोई चोर हो, न कोई कृपण हो,न कोई मांश मदिरा पीने वाला हो,न कोई अविद्वान- अज्ञानी हो, न कोई परस्त्री गामी हो,तो वेश्याओ का कुलटा स्त्रियो का देश में क्या काम| सभी यज्ञ पूजन पाठ करने वाले हो|
जो वोटो के लिए आपस में झगड़ते है कपट करते है हिंसा करते और करवाते है| लोगो को रूपये के बल पर फुसलाते है डरा- धमका कर वोट लेते है| उनसे क्या आशा रक्खी जाय कि वो न्याय युक्त राज्य करेगे? नेता लोग वोट बटोरने के लिए तो खूब मोटर गाड़िया दौड़ाते है जनता का पैसा तेल में जला देते है लाखो करोडो रूपये खर्च करते है अपना और जनता का समय बर्बाद करते है,लोगो को जाती के नाम पर लड़ाते है जीत जाने के बार एक भी बार ये नहीं पूछने आते भाई आपको कोई तकलीफ तो नहीं? तुम्हारी सहायता से हम राजा के पद पर आसीन हो सके है मेरे भाई तुम्हारा जीवन कैसा चल रहा है ?
पहले राजा लोग शासन करते थे तो राज्य की संपत्ति अपनी नहीं प्रज़ा की मानकर परजा के हित में व्यय करते थे| जनता दरबार में राजा साछात्कार करते थे| उनकी समस्याओ को सुनते और उसका निपटारा तुरंत करवाते थे|
इस पर काली दास जी लिखते है .................
" परजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलि मगृहीत ।
सहस्त्र गुण मुतस्त्र ष्टुमादत्ते हि रसं रविः  ॥
अब राजाओ में स्वार्थ आ गया परजा की सम्पत्ति  का स्वयं उपयोग करने लगे है| जनता के धन से सम्पत्ति से नेताओ के बच्चे अय्यासी करते फिरते देखे जाते है| झूठ बैमानी कपट के बल पर जीत कर आये भ्रष्ट नेता इस मानसिकता के है की किसी भाति कुर्सी मिल पायी है अब पांच वर्ष कोई चिंता नहीं जितना संग्रह कर सको कर लो आगे का कोई भरोसा नहीं देश चाहे दरिद्र ही क्यों ना हो जाए लोग आत्म हत्या ही क्यों ना कर ले ये नेता यह रणनीति बनाते है कि धन पशुवो से धन कैसे निकाला जाय फिर क्यों ना भूमि के खण्ड खण्ड करके  दुश्मन को बेच दिया जाय, जिस पर वे अत्याचारी कतलखाने खोल के देश की जनता को काट के बेचे, या  गाय  को| वर्तमान वोट प्रणाली में जिसकी संख्या अधिक हो वह जीत जाता है और राज्य करता है शासन करता है विचार  करो  मेरे भाई ! समाज में ज्ञानियो कि संख्या अधिक है, या मूर्खो कि, सज्ज्नों कि संख्या अधिक है, कि दुष्टो की ,इमानदारो कि संख्या अधिक है, या बेईमानो कि, अध्यापको कि संख्या है कि, विधार्थियो कि, जिनकी संख्या अधिक है ,वे ही वोट के बदले शासन करेगे, फिर देश कि दशा क्या होगी विचार करो| 

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