Monday, 10 March 2014

आज का सुविचार अहंकार भगवान का भोजन है


                    त्यागना है  तो 

              अहंकार का त्याग करो !


एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया । अहंकार वो भी अपने बाहुबल का और वो भगवान कि सत्ता को भूल गया क्योकि स्वाभाविक है "सत्ता पाहि......." अर्थात सत्ता को प्राप्त कर लेने के पश्चात कौन नहीं मदमस्त हो जाता है उसके समस्त इच्छाओ कि पूर्ति थोड़े ही परिश्रम से पूर्ण हो जाती है| यही कारण है वो परमात्म सत्ता को भूल बिसर -जाता है और सभी में अपनी सत्ता को जान कर जीवन व्यर्थ गवाने लग जाता है| भगवान अपने भक्त का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहते है|

यही कारण था भगवान अर्जुन के अहंकार को उतने में ही समाप्त कर देते है इससे पहले कि अर्जुन पतन के मार्ग पर चल पड़ते|

"कृष्ण कहते है , अर्जुन ! सम्भल जा , सामने रवि का नन्दन खड़ा है|बाण धारी बहुत हो बड़े तुम किन्तु बाण विद्या में तुमसे बड़ा है"


भगवान अर्जुन के अहंकार को समाप्त करने हेतु बोले ………………

"हे पार्थ ! निःसंदेह आप धनुर विद्या में पारंगत है , यथार्थ है कि तुम्हारे सोलहवे संस्कार के मार्ग दर्शक गुरु होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुवा है "|

"हे पार्थ ! हे पार्थ निः संदेह तुम्हारी विजय कि अनुभूति हम प्रत्यक्ष देख रहे है, किन्तु उसमे आने वाले संदेह को भी देख पा रहे है"|

अतः "हे पार्थ ! जरा सम्भल कर वार करो , कही मेरा संदेह सत्य में न बदल जाए अर्थात अभी तुम्हे और त्याग कि आवश्यकता है ,क्योकि सन्मुख सूर्य देव कि शक्तियो को धारण किये हुए|

स्वयं भू -भूत भावन भगवान शिव के अंशावतार  "श्री राम जी के वंशज के तारण हार ,भगवान परशुराम जी के परम स्नेही पुत्र ,स्वरुप, एकमात्र शिष्य दान वीर राजा "कर्ण" युद्ध में अडा है|

अतः हे पार्थ ! "सर्व  व्यापक  सर्वत्र समाना .............

मेरे कहे वचन को ध्यान धर और अपने अहं भाव को त्याग कर युद्ध कर|

भगवान कि कही गयी गुरु वाणी को संज्ञान में लेने से अर्जुन को भगवान कि माया के दर्शन करने पड़े\

भगवान वाशुदेव ने अपनी माया को क्षण भर के लिए विराम दिया और अर्जुन ने बाण कि वर्षा करना आरम्भ किया तभी एक बाण तेजी से आया और अर्जुन के रथ को भूमि के ११ हजार योजन ले कर जा पहुचा तभी अर्जुन अपने वर्त्तमान में आ गये और भगवान कि स्तुति करने लगे .............
अर्जुन चिल्ला के बोले " हे प्रभु तस्मात्वमेव मम दीन बंधू ............
हे दीनानाथ ! मेरी रक्षा करो मेरी रक्षा करो …………………………।
करुण पुकार सुन कर भगवान कृष्ण कन्हैया रास रचैया अर्जुन के रथ को उठा कर पृथ्वी पर पुनः स्थापित किये और बोले अर्जुन हमारी कही बात को निरर्थक ना जानो अन्यथा ब्रह्म भी तेरा सहयोग छोड़ देगा|

क्षण कि ऊर्जा कम होने से तुम्हारी ये गति हुयी और यदि ब्रह्म रुष्ट हो जाए तो तेरी गति उसके भी हाथ में नहीं होगी फिर तो काल ही निर्णय कर सकता है|

तेरे रथ को हनुमान जी के आशीर्वाद ने रोक दिया ऊपर अपनी ध्वजा को देखो शिव जी कि कृपा तुझे प्राप्त है तभी तेरे द्वारा मारे गए बाणों से कर्ण का संघार निश्चित है|

परशुराम तेरे भी गुरु हुए है अतः उनका ध्यान कर और बाण चला तेरी विजय होगी ।
इस प्रकार अभिमान को त्याग कर भगवान परशुराम का ध्यान करके अर्जुन ने कर्ण को पराजित किया|

अर्जुन ने उसी क्षण अहंकार का त्याग कर देने का संकल्प कर लेता है|

बंधुवो ! अहंकार को साथ ले कर, उसे  अपना मान कर भगवान कि कृपा कदापि नहीं प्राप्त की जा सकती है| 
                                           

                                                             ज्योतिषाचार्य पण्डित विमल त्रिपाठी 
                                                               नर्वदेश्वर महादेव साईं धाम आश्रम 
                                                                                 लखनऊ  
                                                                            9335710144

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